[Hindi] ॐकार का जादू: चेतना की तीन अवस्थाएँ। cover art

[Hindi] ॐकार का जादू: चेतना की तीन अवस्थाएँ।

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[Preview books] [Borrow books] [Pause] पिछले एपिसोड में हम चर्चा कर रहे थे कि प्राचीन भारतीय चेतना की अवधारणा को किस प्रकार देखते थे। एक विशिष्ट उदाहरण के रूप में मैंने उपनिषदों में से एक, 'माण्डूक्य उपनिषद' को लिया था। माण्डूक्य उपनिषद अथर्ववेद का एक भाग है।यह छोटा-सा उपनिषद बताता है कि परम सत्य चेतना की चार अवस्थाओं के माध्यमसे किस प्रकार प्रकट होता है। वह उस परम सत्य को 'ॐकार' कहता है। यह चेतना की चार अवस्थाओं को जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय के रूपमें पहचानता है।ये अवस्थाएँ ॐकार द्वारा धारण किए गए असंख्य रूपों में विद्यमान हैं। जैसा कि हमने पहले चर्चा की थी, यह निश्चित रूपसे संभव है क्योंकि ॐकार देश और काल से परे है। ॐकार के विभिन्न रूप ही पूरे ब्रह्मांडमें व्याप्त जीव हैं। चूँकि वे रूप देश और काल के नियमों के अधीन हैं, इसलिए वे एक समयमें केवल एक ही अवस्था में रहसकतेहैं।इस एपिसोड में हम इन चार अवस्थाओं में से पहली तीन अवस्थाओं के बारेमें जानेंगे। सबसे पहली अवस्था जागने की अवस्था है, जिसे चेतना की 'जाग्रत' अवस्था कहा जाता है। इस अवस्था में जीव अपने शरीर के बाहर की दुनिया के साथ संपर्क करता है।वह अपने शरीर के बाहर की दुनिया से जानकारी एकत्र करने केलिए अपनी पाँच ज्ञानेन्द्रियों, जैसे आँखों और कानों, का उपयोग करता है। फिर वह उस जानकारी को अपने मन, बुद्धि, अहंकार और अन्य मानसिक क्षमताओं की सहायता से संसाधित करता है।जानकारी संसाधित होजानेकेबाद शरीर बाहरी वस्तुओं के साथ क्रिया करनेकेलिए अपने पाँच कर्मेन्द्रियों, जैसे हाथों और पैरों, का उपयोग करता है। प्राण जैसी पाँच जीवन-शक्तियाँ इस पूरी प्रक्रिया में शरीर और मन को सहारा देती हैं।मूल रूपसे जाग्रत वह चेतना की अवस्था है जो शरीर के बाहर स्थित स्थूल वस्तुओं के साथ व्यवहार करती है।उपनिषद इसका वर्णन इस प्रकार करता है।तंत्रिका-विज्ञान इसे किस प्रकार देखता है?तंत्रिका-विज्ञान की शब्दावली में इसे Access Consciousness कहा जाता है। तंत्रिका-विज्ञानी इस बातको काफी हदतक समझ चुके हैं कि शरीर और मस्तिष्क इस प्रकार की चेतना को किस प्रकार संभालते हैं।मस्तिष्क में विभिन्न विशिष्ट क्षेत्र होते हैं जो बाहरी ज्ञानेन्द्रियों से आनेवाली जानकारी को संसाधित करते हैं। जानकारी ...
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