[Hindi] ओंकार का रहस्य : जो कुछ भी है, वह सब ओंकार ही है! cover art

[Hindi] ओंकार का रहस्य : जो कुछ भी है, वह सब ओंकार ही है!

[Hindi] ओंकार का रहस्य : जो कुछ भी है, वह सब ओंकार ही है!

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[Preview books] [Borrow books] [Pause] पिछले एपिसोड्स में हमने बात की थी कि आधुनिक न्यूरोसाइंटिस्ट्स चेतना को कैसे समझाते हैं। वे चेतना को हमारे दिमाग औरउसकी कार्यप्रणाली से जोड़कर देखते हैं। उनकी नज़र में चेतना का मतलब है 'दिमाग की सक्रिय गतिविधि'। या फिर दिमाग के काम करने के तरीके से पैदा होनेवाला एकअनोखा फिनोमिना।इसके विपरीत, डेविड चैल्मर्स जैसे कॉग्निटिव फिलॉसफर्स इस बात से कैसे असहमत हैं, इसपर भी हमने चर्चा की थी। चैल्मर्स जैसों के मुताबिक, चेतना पूरी तरह से एक व्यक्तिगत औरआंतरिक अनुभव (subjective phenomenon) है। वे तर्क देते हैं कि इसे दिमाग के न्यूरॉन्स जैसी भौतिक चीज़ों के काम करने के तरीके तक कभी सीमित नहीं किया जा सकता। उनकी सोच में चेतना कोई भौतिक चीज़ नहीं है; बल्कि वह अपने आप में रहनेवाली एक स्वतंत्र शक्ति है। दिमाग तो सिर्फ उसे ज़ाहिर करने का एकज़रिया मात्र है।इसके अलावा, कुछ लोग ऐसे भी हैं जो खुद को 'पैनसाइकिस्ट्स' (सबमें चेतना देखने वाले) कहते हैं। वे परमाणु औरउप-परमाणु कणों जैसी भौतिक चीज़ों में भी चेतना को देखते हैं। उनका यह दावा है कि इन सूक्ष्म कणों की चेतना ही आपस में मिलकर मानव चेतना के रूप में सामने आती है!आइए, अब समय के पहिए को हज़ारों साल पीछे घुमाते हैं। मैं चेतना के बारे में कुछ बिल्कुल अलग विचार आपके सामने रखना चाहता हूँ। ये वे विचार हैं जो हज़ारों साल पहले भारत के प्राचीन दार्शनिकों के थे; यानी उपनिषदों के ऋषियों का नज़रिया। इन ऋषि-मुनियों के पास आज के पश्चिमी दार्शनिकों की तरह आधुनिक शब्दावली नहीं थी, और न ही आज के न्यूरोसाइंटिस्ट्स द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले अत्याधुनिक उपकरण थे।फिर भी, इतने प्राचीन काल में भी उनके पास जो वैचारिक स्पष्टता थी, उसे देखकर मैं दंग रह जाता हूँ। मैं उनके विचारों का सम्मान सिर्फ इसलिए नहीं करता कि मैं उनसे पूरी तरह सहमत हूँ। बल्कि इसलिए, क्योंकि उनके विचारों में सिर्फ इंसानों को ही नहीं, बल्कि इस दुनिया के चेतन औरअचेतन (सजीव औरनिर्जीव) सब कुछ को एक ही सूत्र में पिरोने की अद्भुत क्षमता है।आज की चर्चा के लिए मैंने सबसे प्राचीन दार्शनिक ग्रंथों में से एक 'मांडूक्य उपनिषद' को अपना आधार बनाया है। यह अथर्ववेद का हिस्सा रहा एक उपनिषद है। आकार में यह बेहद छोटा होने के ...
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