Karnputra Aur Astra (Hindi Edition)
प्रारब्ध संघर्ष साहस
Failed to add items
Add to basket failed.
Add to wishlist failed.
Remove from wishlist failed.
Adding to library failed
Follow podcast failed
Unfollow podcast failed
3 Months Free
Buy Now for £15.31
-
Narrated by:
-
Dharmendra Gohil
-
By:
-
Manoj Ambike
“आचार्य, आपने मुझे शिक्षा देने से मना क्यों किया?”
आचार्य शांत ही रहे। कुछ क्षण ऐसे ही बीत गए।
“युगंधर कहां है? आपने उसे कहीं भेजा है? आखिर चल क्या रहा है? कोई मुझसे बात क्यों नहीं कर रहा?” वह एक के बाद एक प्रश्न पूछ रहा था।
किंतु आचार्य शांत ही थे।
“सुवेध, एक गहरी सांस लो...” आचार्य ने अपना मौन तोड़ा। “तुम्हारे जैसे शिष्य का मिलना किसी भी गुरु का सौभाग्य होगा। मैं तुम्हें अस्वीकार नहीं कर रहा हूं, परंतु मेरे मन में कुछ और ही योजना चल रही है। तुम्हारी क्षमताओं का उचित प्रकटीकरण करना हो तो उसके लिए उसी सामर्थ्य के गुरु का होना आवश्यक है। मैं संभवत: तुम्हें शस्त्रों में पारंगत कर भी दूं, परंतु तुम्हारी क्षमता अस्त्रों पर प्रभुत्व पाने की है। उसके लिए तुम्हें उचित स्थान पर जाना ही होगा।”
“अस्त्र?” सुवेध के शब्दों में प्रश्न झलक रहा था।
“शस्त्र एक कला है, एक कौशल है। परंतु अस्त्र एक विद्या है। शस्त्रों की शिक्षा तुम्हें सहज मिल सकती है। परंतु अस्त्रों पर प्रभुत्व पाना इतना सरल नहीं। शस्त्रों का कौशल आत्मसात किया जा सकता है, किंतु अस्त्र विद्या प्राप्त करने के लिए योग्य गुरु चाहिए। निश्चित ही उन्हें प्राप्त करने के लिए तुम्हें बहुत संघर्ष करना होगा। परंतु...” कहकर शैलाचार्य शांत हो गए।
“परंतु क्या आचार्य?” सुवेध को यह मौन सहन नहीं हो रहा था।
कुछ समय यूं ही शांत बीत गया।
“कुछ प्रश्नों के उत्तर पाए बिना मुझे आगे का मार्ग दिखाई नहीं देगा और न ही यह संकेत मिल पा रहा है कि तुम्हें किसके पास भेजूं।” शैलाचार्य ने गहरी सांस छोड़ी।
Please note: This audiobook is in Hindi.
©2025 MyMirror Publishing House Pvt. Ltd. (P)2026 Audible Singapore Private Limited